सुप्रीम कोर्ट ने डिप्टी कलेक्टर को तहसीलदार बनाने का दिया आदेश, क्या है मामला ?

पीठ ने आंध्र प्रदेश सरकार को याचिका करता को तहसीलदार के पद पर पदावनत करने का निर्देश दिया। साथ ही अधिकारी को ₹1,00,000 का जुर्माना भरने का भी निर्देश दिया। पीठ ने यह आदेश अधिकारी द्वारा दायर याचिका पर पारित किया गया है। जिसमें उच्च न्यायालय की खंडपीठ के आदेश अधिकारी द्वारा दायर याचिका पर पारित किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने डिप्टी कलेक्टर को तहसीलदार बनाने का दिया आदेश , क्या है मामला? 

  • रिपोर्ट : मुकेश कुमार : क्राइम एडिटर इन चीफ : नई दिल्ली। 

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि अदालत के आदेशों की अवहेलना कानून की शासन की बुनियाद पर हमला है।

उसने आंध्र प्रदेश सरकार को एक डिप्टी कलेक्टर को तहसीलदार के पद पर पदावनत करने का निर्देश दिया।

अधिकारी ने उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश की अवहेलना की थी। जनवरी 2014 में गुंटूर जिलों में झोपड़ियों को हटा दिया था।

मामले की सुनवाई जस्टिस बी आर गवई और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने की। पीठ ने कहा है कि हम नरम रुख अपनाते हैं, लेकिन सभी को यह संदेश दिया जाना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति, चाहें वह कितना भी बड़ा क्यों ना हों, कानून से ऊपर नहीं है।

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न्याय मूर्ति गवई ने कहा, हम चाहते हैं कि पूरे देश में यह संदेश जाए कि पूरे देश में कोई भी अदालत के आदेश की अवहेलना बर्दाश्त नहीं करेगा।

पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश की पुष्टि की। जिसमें उन्हें अपने आदेश की जानबूझकर और पूर्ण अवज्ञा के लिए दोषी ठहराया था। लेकिन अधिकारी को 2 महीने के कारावास की सज़ा सुनाने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को संशोधित कर दिया।

पीठ ने कहा है कि हम सजा में और संशोधन करते हैं और याचिका कर्ता को उसके सेवा के पदानुक्रम में एक स्तर नीचे करने की सज़ा सुनाई जाती है।

पीठ ने आंध्र प्रदेश सरकार को संशोधित कर दिया।  अधिकारी को ₹1,00,000 का जुर्माना भरने का भी निर्देश दिया। पीठ ने यह आदेश अधिकारी द्वारा दायर याचिका पर पारित किया। जिसमें उच्च न्यायालय के खंडपीठ के आदेश को चुनौती दी गई थी। जिसने अवमानना कार्यवाही के ख़िलाफ़ उनके अपील को ख़ारिज कर दिया था।

उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। जिसमें अधिकारी को उसके आदेश की अवज्ञा के लिए 2 महीने के कारावास की सजा सुनाई गई थी।

एकल न्यायाधीश का आदेश उन याचिकाओं पर आया था, जिनमें आरोप लगाया गया था कि अधिकारी, जो उस समय तहसीलदार थे, उन्होंने 11 दिसंबर 2013 के निर्देश के बावजूद जनवरी 2014 में गुंटूर जिले में जबरन झोपड़ियां हटाई।

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